भारत प्रसिद्ध रूप से पौराणिक कथाओं, लोककथाओं और किंवदंतियों का देश है और बांधवगढ़ के लिए भी यही सच है। किंवदंती है कि बांधवगढ़ का किला भगवान राम, जो सबसे प्रतिष्ठित हिंदू भगवान-अवतार में से एक थे; द्वारा अपने भाई लक्ष्मण को दिया गया था, लंका पर नजर रखने के लिए और इसलिए किले को "बांधवगढ़" (बांधव - भाई, गढ़ - किला) नाम मिला। ऐसा माना जाता है कि वानर-देवता हनुमान और उनके अनुयायियों ने किले को अभेद्य बनाने के लिए ऊंची चट्टान-दीवारों को खड़ा कर दिया था।
इस किले का उल्लेख ‘नारद पंच रत्न’ और शिव संहिता पुराण(हिंदू धर्म में विभिन्न देवताओं की स्तुति करने वाले प्राचीन हिंदू ग्रंथ) में भी मिलता है। बांधवगढ़ की पहाड़ियों में पाई गयी मानव निर्मित गुफाएं अपने शिलालेखों और रॉक-पेंटिंग के अध्यान के बाद पुरातत्वविदों उपरांत यह तो मन गया है की अगर प्रगेतिहासिक नहीं तो भी ईसा पूर्व काल की तो जरूर हैं।
सबसे पहले उपलब्ध ऐतिहासिक उल्लेख "भीमसेनी संवत" से है, जो 300 ईस्वी पूर्व का है, जिसके दौरान किला भारिवास वाकाटक राजवंश के अधीन था। एक गुफा में आज भी राजा भीमसेन के शिलालेख मिलते हैं। इसके बाद किला सेंगर, कलचुरी राजपूतों और उसके उपरान्त बघेलों के कब्जे में आ गया, जो 1494 ईस्वी तक इस क्षेत्र पर शासन कर रहे थे। 1495-1535 ई. के काल खंड में यहाँ कुरुवंशियों ने राज किया, हालांकि यह 1535 ईस्वी में फिर से बघेलों के शासन में आ गया, जिन्होंने फिर यहाँ भारत के स्वतंत्र होने तक (1947) राज किया।
1535 ईस्वी के उपरांत अपने राजकाल के वर्ष 1617 ई. में बघेलों ने अपनी राजधानी को रीवा में स्थानांतरित करने का फैसला किया जिसने न केवल बघेलों को रीवा के महाराजाओं के रूप में प्रसिद्ध किया, बल्कि यह कदम इस क्षेत्र के लिए एक वरदान भी बन गया। एक बार जब शाही परिवार रीवा चला गया तो किला के अन्दर इंसानी अव गमन धीरे-धीरे कम होता गया और किले के आसपास के गाँव भी अन्य क्षेत्रों में जाने लगे।
लगातार घटते मानव दबाव के साथ,किले के आसपास धीरे धीरे घने और विविध वनस्पतियों और पेड़ों के जंगल पनपने लगे जिससे बाघ और अन्य वन्यजीवों को इस क्षेत्र में अपने आप को स्थापित करने में मदद मिली। किले और आसपास के आवास धीरे-धीरे वीरान होते गए और 1935 ई. में यहाँ के अंतिम कुछ निवासियों ने भी किले को छोड़ दिया था, हालांकि किले का स्वामित्व रीवा के महाराजाओं के पास रहा, जिन्होंने रीवा में जाने के बाद इस क्षेत्र को अपने निजी शिकार गाह के रूप में घोषित कर दिया था| केवल शाही परिवार के लोगों को ही बाघ का शिकार करने का अधिकार था। इस प्रकार स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार के नियंत्रण में आने से पहले, बांधवगढ़ रीवा के महाराजाओं का एक "गेम रिजर्व" था।
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